चार धाम

भारत भूमि में स्थित चार धाम – बद्रीनाथ , द्वारिका , जगरनाथपुरी और रामेश्वरम, जहाँ हिन्दू पौराणिक कथा के अनुसार स्वयं भगवान शिव व भगवान विष्णु वहां निवास करते है। मान्यता है की इन स्थानों के दर्शन मात्र से ही मानव के जीवन का कल्याण हो जाता है। चार धाम जहाँ प्रतिवर्ष सैकड़ो हिन्दू भक्त दर्शन करने बड़ी आस्था के साथ चले आते है। ये ही स्थान उत्तराखण्ड की देवभूमि में स्थित यमुनोत्री , केदारनाथ, बद्रीनाथ , व गंगोत्री को भी प्राप्त है इसे लोग छोटा चार धाम कह कर सम्बोधित करते है।
यमुनोत्री :- उत्तराखण्ड चार धाम यात्रा का प्रारम्भ यमुनोत्री धाम से होता है और हम ये भी कह सकते है की चार धाम का पहला चरण यमुनोत्री धाम है। यहाँ माँ यमुना की उपासना की जाती है। कहा जाता है की माँ यमुना का और विष्णु की गहरा सम्बन्ध है। भगवान कृष्ण के रूप में विष्णु जी का जन्म यमुना तट के समीप मथुरा में हुआ और वहीं से वासुदेव जी कंस से उनके प्राणो की रक्षा के लिए गोकुल के लिए रवाना हुए जैसे जैसे वासुदेव जी आगे बढ़ते गए वैसे वैसे यमुना जी भी भगवन के चरणो को स्पर्श करने हेतु आगे बढ़ने लगी। भगवान कृष्ण के चरणो को स्पर्श करते ही यमुना जी शांत हो गयी। भगवान कृष्ण ने जितनी भी लीलायें की यमुना तट पर ही की चाहे फिर वे गोवर्धन पर्वत उठाना हो या फिर गोपियों के साथ रासलीला रचना। माँ गंगा की तरह पुराणो में भी यमुना भी को भी उच्च स्थान प्राप्त है।

यह मंदिर बंदरपूछ शिखर के समीप है ३१६५ मीटर की उचाई पर स्थित है। मंदिर के कपाट बैसाख महीने की शुल्क पक्ष को अक्षय तृतीया के दिन खुलते है। दीपावली के बाद कार्तिक मास में यम द्वितीय को यहाँ कपट बंद होते है। यहाँ मंदिर के समीप दो कुण्ड है सूर्यकुंड और गौरीकुंड। सूर्यकुंड का तापमान अधिक रहता है जहा भक्तजन आते है और चावल , आलू , दाल, अर्पित करते है और ये पक कर बहार आता है जो की मंदिर पे चढ़ावे के रूप में चढ़ता है। वही गौरीकुंड का जल गुनगुना होता है जहा भक्तजन उस जल से स्नान कर अपनी थकावट भूल जाते है। माँ यमुना का ये मंदिर सदा ही भक्तो को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है।

केदारनाथ:- कहा जाता है की भगवन शिव और भगवन विष्णु धनिष्ट मित्र है इस कारण जहा कहीं भी भगवान विष्णु का मंदिर होता है कुछ ही दूरी पर हम भगवान शिव का मंदिर भी पायेगे। केदारनाथ मंदिर भी भगवान शिव की उपासना हेतु जाना जाता है। प्राचीन कथा के अनुसार पांडवो ने महाभारत के युद्ध में अपने निकट सम्बन्धियों का वध के प्रायश्चित स्वरूप भगवान शिव के आराधना की परन्तु भगवन शिव पांडवो के दर्शन नहीं देना चाहते थे। अंत वे भैंसे का रूप धारण कर समीप चरने वाले भैसो के बीच शामिल हो गए लेकिन पांडवो ने उन्हें पहचान लिया जैसे ही भगवन शिव को उनके आगमन का आभास हुआ वह तुरंत धरती में प्रवेश करके अंतर ध्यान होने का प्रयास किया पर पांडवो ने उन्हें पहचान लिया और उनको पकड़ने के लिए आगे बड़े और भैंसे का पिछला भाग पकड़ लिया। भैंसे का अगला भाग नेपाल पशुपतिनाथ में प्रकट हुआ।

अंत भगवान शिव ने पांडवो की तपस्या से संतुष्ट हो कर उनको सम्बन्धियों की हत्या के पाप से मुक्त कर दिया बाद में पांडवो ने केदारनाथ में मंदिर का निर्माण कराया। शिव जी की भुजाये तुगाबाद में मुख रुधरनाथ में नाभि मदमवेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। मंदिर के दर्शन सुबह से दिन के एक बजे तथा सायं ५ बजे से ८ बजे तक किये जा सकते है। दिन में यात्रियों के दर्शन के लिए मंदिर बंद रहता है।

बद्रीनाथ:- चार धामो में से एक धाम है बद्रीनाथ धाम जो की उत्तराखंड राज्य के चमोली जिले में स्थित है। जिसे कई लोग विशाल बदरी भी कहते है। एक पौराणिक कथा अनुसार एक बार भगवान विष्णु माता लक्ष्मी से रूठ कर विशलपुरी में ऋषि समूह के साथ ध्यान लीं हो गए जब माता लक्ष्मी को इस बात की जानकारी हुई तो वह तुरंत विष्णु जी को मानाने उनके पास गयी। परन्तु विष्णु जी ध्यान में इतने लीन थे की उनको अबास ही नही हुआ की माता लक्ष्मी उनके निकट खड़ी है। माता ने देखा की विष्णु जी तो सूर्य की तेज़ रोशनी में ध्यान मगन है।

इसलिए वे बद्री (बेर ) नामक वृक्ष बन के उन पर छाया करने लगी। जब विष्णु जी ने अपने नेत्र खोले तो ये नज़ारा देख सन्न रह गए। तब माँ लक्ष्मी जी के प्रेम को देख कर उन्होंने एक वरदान मांगने को कहा तब लक्ष्मी जी ने हमेशा विष्णु जी के साथ रहने का वरदान माँगा तब विष्णु जी ने कहा की आज से हमारे साथ तुमको भी पूजा जाएगा इस कारण से यह स्थान बद्रीनाथ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर प्रत्येक वर्ष नवम्बर से अप्रैल तक बंद रहता है इस दौरान ये स्थान बर्फ से ढाका रहता है। उसके बाद मई से अक्टूबर तक मंदिर के कपाट भक्तो क लिए खोल दिए जाते है।

गंगोत्री:- भारत एक ऐसा देश है जहा नदियों को भी पूजनीय स्थान प्राप्त है। गंगा नदी उन्ही में से एक है जो जीवनदायिनी नदी है गन्दा के घाट के नीचे कई सभ्यताओ का जनम हुआ गंगा नदी उन्ही में से एक है जो जीवनदायिनी नदी है गन्दा के घाट के नीचे कई सभ्यताओ का जनम हुआ और कई सभ्यताएँ फली फूली। माँ गंगा को पृथ्वी पर लाने श्रेय भागीरथी जी को जाता है। पौराणित कथा स्वाग लोग से माँ गंगा जिस स्थान पर अवतरित हुई थी उसी स्थान पर ये गंगोत्री मंदिर बना हुआ है। इसलिए माँ गंगा की उपासना हेतु यहाँ कई भक्तजन बड़ी सख्या में आते है। मंदिर में गंगा की मूर्ति के साथ साथ यमुना की , सरस्वती भागीरथी तथा शकराचार्य की मूर्ति स्थापित है। मंदिर अक्षय त्रित्य को खुलता है दीपावली के बाद गोवर्धन के दिन बंद होता है। यहाँ प्रसाद के तौर पर गंगा जल मिलता है जो भक्तजन अपने साथ अपने घर ले जाते है।

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