चिपको आंदोलन

प्रकृति, जिसके आगे हम सभी नतमस्तक है। पृथ्वी पर जीवन बसाने वाली प्रकृति नदियों , झीलों , पर्वतो , पेड़ो आदि द्वारा हमारा एक माँ की भांति लालन पोषण करती है। धरती पर, किसान जब अपनी परिश्रम को अनाज के रूप में फूटता हुआ देखता है तो वह भी इसका श्रेय प्रकृति को देता है। लेकिन फिर भी कहीं न कहीं मनुष्य इसी प्रकृति का, अपने हितों की पूर्ति हेतु इस पर मनमाने तरीके से अत्याचार करे जा रहे है। जबरन पडों की कटाई भी इसका हिस्सा है। जंगल के जंगल खत्म हो रहे है। जिस कारण वन्य जीव भी बेघर हो रहे है। कई प्रजातियां विलुप्त होने की स्थिति में आ चुकी है और कुछ हो चुकी है। चिपको आंदोलन भी हमें शिक्षा देता है की जिस प्रकृति ने मनुष्य जाति को जीवन दान दिया है उसके प्रति भी मनुष्य के कर्तव्य बनते है। पेड़ो को बचा कर रखना, अपनी भूमि जंगलो से प्यार करना सिखाता है, चिपको -आंदोलन। चिपको – आंदोलन की मकसद था पेड़ों को काटने से बचाना इसके लिए पेड़ काटने आये मज़दूरों से पहले खुद को काटने की बात कहना फिर पेड़ों से चिपक जाना।

चिपको आंदोलन को जन्म देने की भूमिका निभायी १९६२ मई हुए भारत – चीन के युद्ध ने, जिसके कारण उत्तराखण्ड के जन- जीवन प्रभावित होने लगा। चीन व तिब्बत से व्यापार बंद होने से स्थिति और दुर्लब हो गयी लोगो की जीविका पूणतः पेड़ों पर निर्भर रहने लगी। जंगलो से वह अपने लिए घास , फल , औषधि प्राप्त करते थे। दूसरा यह कि भारत अब सीमा सुरक्षा को लेकर काफी गंभीर था। इस कारण भारत – चीन सीमा पर मार्गों का निर्माण किये जाने लिए सरकार की नज़र अब हिमालय की वन सम्प्रदा पर आ गयी। इससे हिमालय में खड़ी वन सम्पदा सरकार, ठेकेदारों, माफियाओं की नजर में तथा पहुँच में आ गयी।

हिमालय में पेड़ों की ठेकेदारी प्रथा से अंधाधुंध कटाई के साथ-साथ असुरक्षित खनन, सड़क निर्माण, जल विद्युत परियोजनायें व पर्यटन सहित अन्य विकास कार्यों से वनों का विनाश होना शरू हो गया इतने असुरक्षित विकास कार्यों व वनों की अंधाधुंध कटाई को हिमालय झेल नहीं पाया और इन सबके परिणाम स्वरूप सन 1970 में ऐसी प्रलयंकारी बाढ आयी। भयंकर बाढ़ आने के बाद उत्तराखण्ड निवासियों ने इसके प्रति जागरूकता दिखाई । इस आन्दोलन के मुख्य संस्थापक श्री चंडी प्रसाद भट्ट हैं। जिन्होंने हर गांव में महिला मंगल दलों कि स्थापना की चिपको आन्दोलन प्रचार गौरा देवी की घटना से ही हुआ था। इसीलिये श्रीमती गौरादेवी को इस आन्दोलन की जननी तथा सूत्रधार कहा जाता है।जिन्होंने पेड़ काटने आये ठेकेदार का सामना बड़े ही साहस के साथ किया। ठेकेदार ने बन्दूक निकालकर इन्हें धमकाया तो गौरा देवी ने सामने से गरजते हुये कहा “पहले मुझे गोली मारो फिर काट लो हमारा मायका” पेड़ काटने आये मजदूर सहम गये। गौरा देवी के अदम्य साहस से बाकि महिलाओं में भी शक्ति का संचार हुआ और महिलायें पेड़ों के चिपक गई और कहा कि हमारे साथ इन पेड़ों को भी काट लो। ऋषिगंगा के तट पर नाले पर बना सीमेण्ट का एक पुल भी महिलाओं ने तोड़ डाला, जंगल के सभी मार्गों पर महिलायें तैतात हो गई। ये छोटी सी चिंगारी आग की भांति पूरे जिले में फैल गयी। महिलाओं के इस साहसी कार्य को हर जगह से सराहना प्राप्त हुई और सरकार के साथ साथ वन प्रेमी और वैज्ञानिको भी इस आंदोलन में बढ़- चढ़ के इस आंदोलन के समर्थन में आ गए।
टिहरी गढवाल के समाजसेवी सुन्दरलाल बहुगुणा भी इस मुहीम में जुड़ गये जिन्होंने चिपको आंदोलन को विस्तार दिया और ‘चिपको आन्दोलन’ का घोषवाक्य बना :-

क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार ।

मिट्टी, पानी और बयार, जिन्दा रहने के आधार ।।

सरकार ने इस हेतु डा० वीरेन्द्र कुमार की अध्यक्षता में एक जांच समिति का गठन किया। जांच के बाद पाया गया कि रैंणी के जंगल के साथ ही अलकनन्दा में बांई ओर मिलने वाली समस्त नदियों ऋषि गंगा, पाताल गंगा, गरुड़ गंगा, विरही और नन्दाकिनी के जल ग्रहण क्षेत्रों और कुवारी पर्वत के जंगलों की सुरक्षा पर्यावरणीय दृष्टि से बहुत आवश्यक है। यह ‘चिपको आन्दोलन’ का ही परिणाम ही था जो १९८० में वन संरक्षण अधिनियम बना और केंद्र सरकार को पर्यावरण मंत्रालय का गठन करना पड़ा। सन १९८७ में इस आन्दोलन को सम्यक जीविका पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

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