देवप्रयाग (भागीरथी तथा अलकनंदा का पावन संगम )

सदियों से दुनिया को अध्यात्म की शिक्षा देता भारत जहाँ प्रकृति को ईश्वर की भांति पूजा जाता है। जहाँ भूमि , अग्नि , जल , वायु , आकाश , पर्वत सब को ईश्वर का स्थान प्राप्त है। इन सबको उसी तरह पूजा जाता है जैसे की बाकी देवताओ को यह भारत को प्रकृति की शुभ देन ही है की विशाल हिमालय उसे उत्तरी ओर से मुकुट की भांति घेरे हुए है। उसी हिमालय की गोद प्रकट होती है गंगा नदी जिसे जीवनदायिनी गंगा भी कहते है।

हिन्दू धर्म में मनुष्य के जीवन से मरन तक गंगा जल का विशेष महत्व है। माँ गंगा युगों- युगों से भारत की संस्कृति का अनमोल हिस्सा रही है। पौराणिक कथा के अनुसार माँ गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए भागीरथी जी ने वर्षो तक तपस्या की व गंगा नदी के तीव्र वेग के कारण पृथ्वी जल प्रलय की स्थिति बन गयी थी तब भगवान शिव ने गंगा जी को अपनी जटाओ में स्थान दिया। हिमालय के बीच से होती हुई गंगा का आगमन गोमुख नमक स्थान से होता है। गोमुख से गंगोत्री आने के बाद माँ गंगा उत्तर की ओर मुड़ जाती है। हिमालय की चोटियों के बीचों बीच होती हुई माँ गंगा कई भागो में बंट जाती है।

उत्तर से भगीरथ तथा पूरब से अलकनंदा के पावन संगम पर बसा है देवप्रयाग जो की पांच प्रयागों में से एक प्रयाग है। हिन्दू पुराणों में वर्णन है की जब राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर उतरने को राजी कर लिया तो ३३ करोड़ देवी-देवता भी गंगा के साथ स्वर्ग से उतरे। इस कारण इस स्थान का नाम देवप्रयाग पड़ा इसी स्थान पर भगवन राम ने तपस्या की थी और कुछ मान्यता ये है की देवशर्मा नामक ऋषि ने यहाँ कठोर तप करने के कारण यह स्थान का नाम देवप्रयाग पड़ा। प्रयाग किसी भी संगम को कहा जाता है और ये वो स्थान है जहाँ अलकनंदा व भागीरथी मिलकर आगे पवित्र गंगा नदी के नाम से जानी जाती है। ऋषिकेश से ७१ किलोमीटर से दूर ये नगरी तपस्तली रही है।

देवप्रयाग में श्री रघुनाथ मंदिर संगम से कुछ सीढ़ियां चढ़ने के उपरांत आता है। जहाँ भगवन राम की पूजा अर्चना की जाती है। मंदिर में भगवान राम की लगभग ५ फीट उचीं प्रतिमा है भगवान राम दरबार के साथ यहाँ विराजमान है जिसमें राम, लक्ष्मण , सीता , हनुमान , भव्य रूप में प्रदर्शित है। वैष्णव संप्रदाय के मत अनुसार कहा गया है कि जितनी सुविधायें मनुष्य के लिए आवश्यक हैं उतनी सुविधायें भगवान को भी प्रदान की जानी चाहिए इस कारण रघुनाथ मंदिर में भी पूजा का विधान बना हुआ है जैसे अर्थात प्रातः काल स्नान , पूजा , आरती , भोग , विश्राम , शाम को पूजा , रात्रि विश्राम आदि।

भक्तों में इस मंदिर की बहुत मान्यता है इस कारण भक्तजन दूर – दूर से यहाँ भगवान राम के दर्शन को आते है। देवप्रयाग से थोड़ी दूरी पर है प्रतापनगर जहाँ सीमा पर स्थित है माँ चंद्रवदनी का मंदिर इस मंदिर की काफी मान्यता है। पर्यटक जो कोई भी देवप्रयाग आते है वह यहाँ की प्राकृतिक सुंदरता देख कर मंत्रमुक्त हो जाते है। केदारखण्ड अनुसार जहाँ अलखनंदा व भागीरथी का संगम हुआ है और सीता – लक्ष्मण सहित श्री राम चन्द्र जी निवास करते हो उसके सामन प्रवित्र स्थल पृथ्वी पर न कभी हुआ है और न कभी होगा।

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