पंच प्रयागों में विशेष स्थान है कर्णप्रयाग का

कुरूक्षेत्र युद्ध के बाद भगवान कृष्ण ने किया था कर्ण का दाह संस्कार

अलकनंदा तथा पिण्डर नदियों के संगम पर कर्णप्रयाग स्थित है। पिण्डर का एक नाम कर्ण गंगा भी है, जिसके कारण ही इस तीर्थ संगम का नाम कर्ण प्रयाग पडा।अलकनंदा एवं पिंडर नदी के संगम पर बसा कर्णप्रयाग धार्मिक पंच प्रयागों में तीसरा है।एक किंबदंती के अनुसार कर्णप्रयाग का नाम कर्ण पर है जो महाभारत का एक केंद्रीय पात्र था। उसका जन्म कुंती के गर्भ से हुआ था और वह पांडवों का बड़ा भाई था। यह महान योद्धा तथा दुखांत नायक कुरूक्षेत्र के युद्ध में कौरवों के पक्ष से लड़ा। एक किंबदंती के अनुसार आज जहाँ कर्ण को समर्पित मंदिर है, वह स्थान कभी जल के अंदर था और मात्र कर्णशिला नामक एक पत्थर की नोक जल के बाहर थी। कुरूक्षेत्र युद्ध के बाद भगवान कृष्ण ने कर्ण का दाह संस्कार कर्णशिला पर अपनी हथेली का संतुलन बनाये रखकर किया था।

यहाँ देवी गंगा तथा भगवान शिव ने कर्ण को साक्षात दर्शन दिया

एक दूसरी कहावतानुसार कर्ण यहाँ अपने पिता सूर्य की आराधना किया करता था। यह भी कहा जाता है कि यहाँ देवी गंगा तथा भगवान शिव ने कर्ण को साक्षात दर्शन दिया था।पौराणिक रूप से कर्णप्रयाग की संबद्धता उमा देवी (पार्वती) से भी है। उन्हें समर्पित कर्णप्रयाग के मंदिर की स्थापना 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा पहले हो चुकी थी। कहावत है कि उमा का जन्म डिमरी ब्राह्मणों के घर संक्रीसेरा के एक खेत में हुआ था, जो बद्रीनाथ के अधिकृत पुजारी थे और इन्हें ही उसका मायका माना जाता है तथा कपरीपट्टी गांव का शिव मंदिर उनकी ससुराल होती है।

वर्ष 1803 की बिरेही बाढ़ शहर प्रवाह में बहा था

बद्रीनाथ मंदिर जाते हुए साधुओं, मुनियों, ऋषियों एवं पैदल तीर्थयात्रियों को इस शहर से गुजरना पड़ता था। वर्ष 1803 की बिरेही बाढ़ के कारण रोक लग गयी क्योंकि शहर प्रवाह में बह गया। उस समय प्राचीन उमा देवी मंदिर का भी नुकसान हुआ। फिर सामान्यता बहाल हुई, शहर का पुनर्निर्माण हुआ तथा यात्रा एवं व्यापारिक गतिविधियां पुन: आरंभ हो गयी।कर्णप्रयाग का नाम कर्ण पर है जो महाभारत का एक केंद्रीय पात्र था। उसका जन्म कुंती के गर्भ से हुआ था और इस प्रकार वह पांडवों का बड़ा भाई था। यह

महान योद्धा तथा दुखांत नायक कुरूक्षेत्र के युद्ध में कौरवों के पक्ष से लड़ा।

कर्णप्रयाग के मंदिर की स्थापना 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा पहले हो चुकी थी

पौराणिक रूप से कर्णप्रयाग की संबद्धता उमा देवी (पार्वती) से भी है। उन्हें समर्पित कर्णप्रयाग के मंदिर की स्थापना 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा पहले हो चुकी थी। कहावत है कि उमा का जन्म डिमरी ब्राह्मणों के घर संक्रीसेरा के एक खेत में हुआ था, जो बद्रीनाथ के अधिकृत पुजारी थे और इन्हें ही उसका मायका माना जाता है तथा कपरीपट्टी गांव का शिव मंदिर उनकी ससुराल होती है।

गढ़वाल एवं कुमाऊं की ईष्ट देवी

कर्णप्रयाग नंदा देवी की पौराणिक कथा से भी जुड़ा हैं; नौटी गांव जहां से नंद राज जाट यात्रा आरंभ होती है इसके समीप है। गढ़वाल के राजपरिवारों के राजगुरू नौटियालों का मूल घर नौटी का छोटा गांव कठिन नंद राज जाट यात्रा के लिये प्रसिद्ध है, जो 12 वर्षों में एक बार आयोजित होती है तथा कुंभ मेला की तरह महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। यह यात्रा नंदा देवी को समर्पित है जो गढ़वाल एवं कुमाऊं की ईष्ट देवी हैं। नंदा देवी को पार्वती का अन्य रूप माना जाता है, जिसका उत्तरांचल के लोगों के हृदय में एक विशिष्ट स्थान है जो अनुपम भक्ति तथा स्नेह की प्रेरणा देता है। नंदाष्टमी के दिन देवी को अपने ससुराल – हिमालय में भगवान शिव के घर – ले जाने के लिये राज जाट आयोजित की जाती है तथा क्षेत्र के अनेकों नंदा देवी मंदिरों में विशेष पूजा होती है।

नौटियाल इस क्षेत्र के सर्वप्रथम वासी

कर्णप्रयाग की संस्कृति उत्तराखंड की सबसे पौराणिक एवं अद्भुत नंद राज जाट यात्रा से जुड़ी है। नौटी गांव (20 किलोमीटर दूर) के नौटियाल इस क्षेत्र के सर्वप्रथम वासी थे। वे कनक पाल के साथ यहां आये थे। कनक पाल ने 9वीं शताब्दी में पंवार वंश की स्थापना की थी। कर्णप्रयाग की संस्कृति मिश्रित है। यहां के धुनियार सदियों पहले तीर्थयात्रियों को पिंडर नदी के पार सुरक्षित पहुंचाते थे ताकि वे बद्रीनाथ की यात्रा जारी रख सकें। कर्णप्रयाग के निकट गांवों में रहने वाले चरवाहे जो राजस्थान, महाराष्ट्र एवं गुजरात के परिवारों के वंशज थे, वे कर्णप्रयाग आकर यात्रियों को दूध एवं मेवे की आपूर्ति किया करते थे। यहां के कुमाऊंनी परिवार भी मसालों का व्यापार करने आएं और यहीं बस गये और ऐसी ही डिमरी एवं भंडारी ब्राह्मण भी अपनी जीविका चलाने के लिये किया।

गीतों एवं नृत्यों का सामुदायिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान

आज शहर के वासी इन्हीं लोगों के वंशज हैं। बीते वर्षों की तरह आज भी कर्णप्रयाग के लोग अधिकांशत: उन तीर्थयात्रियों एवं यात्रियों की सेवाओं में नियोजित हैं, जो चारधामों की यात्रा पर जाते हुए यहां रूकना पसंद करते हैं।गीतों एवं नृत्यों का सामुदायिक जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान होता है तथा इनकी गहरी जड़ें, कृषि, संस्कृति एवं धर्म के चक्रों से जड़ित हैं। जग्गरों का आयोजन गांवों में होता है और अब ये शहरी क्षेत्रों में सामान्य नहीं होते। इन अवसरों पर स्थानीय देवी-देवताओं का आवाहन गीतों तथा नृत्यों द्वारा समुदाय में शामिल होने के लिये किया जाता है और इसका समापन तब होता है जब देवी या देवता भीड़ के किसी सदस्य के ऊपर आ जाये। महाभारत की कुछ घटनाओं की अनुकृति पांडव नृत्य भी मंचन कला का सामान्य रूप होता है।
नंदा देवी की प्रशंसा के गीत भी सामान्य

कुंजापुरी में गिरा था देवी सती का कुंज भाग

जीतू बगड़वाल या एक स्थानीय नायक या नायिका पर आधारित गीत तथा नंदा देवी की प्रशंसा के गीत भी सामान्य हैं, विशेषकर नंद राज जाट के समय। गीत एवं नृत्य का साथ ढ़ोल एवं दामों निभाते हैं जिसे दास कहे जाने वाले एक विशेष जाति के लोग बजाते हैं।परंपरागत घर पत्थर एवं गाड़ों से बने होते हैं जिनकी छतें स्लेट के टुकड़ों की होती है। स्थानीय रूप से प्रचुर देवदार या चीड़ की लकड़ियों का इस्तेमाल धरणों, दरवाजों, खिड़कियों के ढ़ांचों तथा इन छोटे दो मंजिले भवनों की बाल्कनियों में होता है। नीचे की मंजिल का इस्तेमाल मवेशियों को बांधने या उनके लिये चारा रखने के लिये होता था। संपन्न परिवारों के घरों में खोली पर कुछ गहन लकड़ी की नक्काशी होती जिसके ऊपर सुंदर रूप से गढ़ी लकड़ी की एक गणेश की प्रतिमा होती जिन्हें खोली का गणेश कहा जाता। साथ ही ऐसी नक्काशी बालकनी धारण किये ब्रेकेट पर भी होती थी।

इसके विपरित आज के आधुनिक घरों में स्थान की उपयोगिता पर अधिक बल दिया जाता है जबकि पहले की तुलना में उतना सौंदर्य बोध नहीं होता।कर्णप्रयाग छोटा होते हुए भी काफी बड़े क्षेत्र में फैला है क्योंकि आस-पास के कई गांव नगर पंचायत क्षेत्र में शामिल कर लिये गये है। आप ऋषिकेश से जब कर्णप्रयाग में प्रवेश करते है तो पुराना शहर पिंडर नदी के दाहिने तट पर स्थित है। नदी पर पुल को पार कर आप उमा देवी मंदिर तथा प्रयाग के घाट पहुंच जाते हैं। यह सड़क आगे बद्रीनाथ की ओर चली जाती है। शहर में कई बाजार, होटल, लॉज एवं भोजनालय हैं, जो बद्रीनाथ जाते हुए यात्रियों एवं तीर्थयात्रियों की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।
धड़ रक्षा सूत्र से लपेटा

उमा देवी मंदिर के समीप सीढ़ियों से नीचे उतरकर पिंडर एवं अलकनंदा नदियों के संगम घाट पर पहुंचा जा सकता है। आप जब संगम पर उतरते है तो आप के सम्मुख एक शिव मंदिर आता है, मंदिर में एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है जबकि मंदिर का पुनरूद्धार हाल ही में हुआ है। मंदिर के आर-पार एक विशाल पीपल का पेड़ है जिसका धड़ रक्षा सूत्र से लपेटा हुआ हैं जो अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये भक्तों ने बांधे हैं। और नीचे गंगा मंदिर है जो गंगा मंदिर संगम तट अन्नक्षेत्र द्वारा संचालित है। 10-12 वर्षों पहले इस मंदिर का निर्माण एक भक्त द्वारा कराया गया जबकि अन्नक्षेत्र की स्थापना 20 वर्षों पहले की गयी। गंगा आरती प्रतिदिन शाम में गर्मियों में 7.30 बजे अन्नक्षेत्र के सदस्यों द्वारा संगम पर आयोजित होती है, जिसे 6 वर्ष पहले आरंभ किया गया

मानवाकृति से भी बड़े आकार की कर्ण एवं भगवान कृष्ण की प्रतिमाएं

यह मंदिर संगम के बायें किनारे अवस्थित है जो कर्ण के नाम पर ही है। पुराने मंदिर का हाल ही जीर्णोद्धार हुआ है तथा मानवाकृति से भी बड़े आकार की कर्ण एवं भगवान कृष्ण की प्रतिमाएं यहां स्थापिक है। परिसर में अन्य छोटे मंदिरों में भूमियाल देवता, राम, सीता एवं लक्ष्मण, भगवान शिव एवं पार्वती को समर्पित मंदिर शामिल हैं।मंदिर की स्थापना 8वीं सदी में आदि शंकराचार्य द्वारा हुई जबकि उमा देवी की मूर्ति इसके बहुत पहले ही स्थापित थी। कहा जाता है कि संक्रसेरा के एक खेत में उमा का जन्म हुआ।

अलकनंदा एवं पिंडर नदियों के संगम पर उनकी प्रतिमा स्थापित

एक डिमरी ब्राह्मण को देवी ने स्वप्न में आकर अलकनंदा एवं पिंडर नदियों के संगम पर उनकी प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया। डिमरियों को उमा देवी का मायके माना जाता है जबकि कापरिपट्टी के शिव मंदिर को उनकी ससुराल समझा जाता है। हर कुछ वर्षों बाद देवी 6 महीने की जोशीमठ तक गांवों के दौरे पर निकलती है। देवी जब इस क्षेत्र से गुजरती है तो प्रत्येक गांव के भक्तों द्वारा पूजा, मडान तथा जाग्गरों का आयोजन किया जाता है जहां से वह गुजरती है। जब वह अपने मंदिर लौटती है तो एक भगवती पूजा कर उन्हें मंदिर में पुनर्स्थापित कर दिया जाता है। इस मंदिर पर नवरात्री समारोह धूम-धाम से मनाया जाता है।
वर्ष 1803 की बाढ़ में पुराना मंदिर ध्वस्त हो गया तथा गर्भगृह ही मौलिक

यहां पूजित प्रतिमाओं में उमा देवी, पार्वती, गणेश, भगवान शिव तथा भगवान विष्णु शामिल हैं। वास्तव में, उमा देवी की मूर्ति का दर्शन ठीक से नहीं हो पाता क्योंकि इनकी प्रतिमा दाहिने कोने में स्थापित है जो गर्भगृह के प्रवेश द्वार के सामने नहीं पड़ता। वर्ष 1803 की बाढ़ में पुराना मंदिर ध्वस्त हो गया तथा गर्भगृह ही मौलिक है। इसके सामने का निर्माण वर्ष 1972 में किया गया।मंदिर के पुजारी, आर पी पुजारी, पुजारियों की चतुर्थ पीढ़ी के हैं जो पीढ़ियों से मंदिर के प्रभारी पुजारी रहे हैं। यहां पुजारियों के दस परिवार हैं जो रोस्टर प्रणाली के अनुसार बारी-बारी से कार्यभार संभालते हैं। ये परिवार ही सरकार की सहायता के बिना ही मंदिर की देखभाल एवं रख-रखाव करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *