उत्तराखंड राज्य के लिए अनुच्छेद-370 महत्वपूर्ण! बात निकलेगी तो दूर तक जायेगी!

सवेंदन शील हिमालय को मानवीय गतिविधियों और हस्तक्षेप से बचाना है ? शायद इसका उत्तर है अनुच्छेद-370 या फिर इसी तरह का और कोई कठोर कानून की। यहां बात हो रही है उत्तराखंड राज्य की, अपनी प्राकृतिक सुषमा के लिए जानें जाना वाला उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी जैसे नयनाभिराम दृश्य भी हैं, लेकिन इस प्राकृतिक संपदा का उपयोग सरकार और तमाम माफियों नें अपनें व्यापारिक हितों के लिए जमकर किया। आये दिन नई-नई विद्युत परियोजनाओं को कमजोर और सवेंदनशील पहाड पर थोपा जा रहा हैं, वही सदानिरा नदियों के सतत प्रवाह को रोककर उनके जल को भी प्रदूषित किया जा रहा है,गंगा जैसी पवित्र नदी को बॉधों में डालकर उसकी शाश्वत पवित्रता को खतरे में डाला जा रहा है, वहीं राज्य भर की नदियों से लेकर गाढ-गधेरों में खनन माफिया चॉदी काट रहे हैं खनन से जहॉ नदियो के किनारे बसे नगरं-बस्तियों को खतरा उत्पन्न हो रहा वहीं लगभग सभी नदियों के तटों पर स्थित उपजाऊ खेती के विनाश को खुला आमंत्रण दिया जा रहा है। यहां यह बात करना चाहूंगा कि इस सबके बाद अगर बात अनुच्छेद-370 इस सबके बाद अगर बा की करू तो कोई बात होगी या नही। अगर इस बात बात होती है तो उत्तराखण्ड को भी एक शेर है बात निकलेगी तो दूर तक जायेगी और अगर यही बात किसी ऐसे शख्स के श्रीमुख से निकली हो, जो देश के राजनीतिक क्षितिज पर एक बहुत बडा सितारा हो, तब वह कितनी दूर जायेगी इसे खुद ही समझा जा सकता है।


यहां जम्मू-कश्मीर राज्य पर अनुच्छेद-370 प्रासांगिकता पर टिप्पणी करनें के बजाय, उसकी जो सबसे खास बात, जो आकर्षित करती है वह है राज्य में बाहरी लोगों का राज्य में बसनें पर पूर्ण प्रतिबंध, बाहरी नागरिकराज्य की जमीन पर न तो मकान अथवा भवन ही बना सकते हैं न ही किसी प्रकार से जमीन की खरीद फरोख्त ही, इसके अतिरिक्त इस कानून में तमाम ऐसे प्रावधान भी हैं जो इस पहाडी राज्य की जैव विविधता और नैसर्गिक संपदा को सुरक्षा प्रदान करते हैं, इसलिए जम्मू-कश्मीर राज्य आज भी धरती का स्वर्ग बना हुआ है। ये भी सच्चाई है कि इसी कानून की बदौलत संभवतया जम्मू कश्मीर रियासत को यह तमगा नसीब हुआ है, वरना भारतीय धनकुबेरों की यहॉ कई-कई अट्टालिकाऐं खडी हुई मिलती जो निश्चित रूप से यहॉ की खुबसुरती को तो धब्बा लगाते ही, साथ ही तमाम तरह के प्रदूषणों के साथ यहॉ की आवो-हव्वा में जहर घोलनें का काम करते। बहुत संभव है कि इस राज्य की कुदरती खुबसुरती की सलामती के लिए उसे अनुच्छेद-370 की के दायरे में लाया गया हो ?1947 में जम्मू-कश्मीर रियासत के तत्कालीन शासक हरि सिंह और भारत सरकार के बीच सहमति के हुई थी,सहमति पर राजा हरिसिंह नें दस्तखत किये हैं, बाद में 1952 में राजा हरि सिंह की इसी भावना को ध्यान में रखते समझौता किया गया, और 1974 में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गॉधी और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री (हरि सिंह द्वारा नियुक्त) शेख अब्दुल्ला के बीच हुई सहमति द्वाराभी इस विचार की पुष्टि हुई। हालंाकि राज्य पर अनुच्छेद-370 के प्रावधान पर देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियो,बुद्विजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के भिन्न-भिन्न मत,विचार और तर्क हैं, लेकिन भारत राष्ट्र की ्यअनेकता में एकता्य वाली विशेषता को ध्यान में रखते हुए, इस राज्य पर इस अनुच्छेद से ज्यादा असहज भी नहीं है, क्योंकि देश को आजाद हुए छरू दशक से उपर हो गये,ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जिससे अनुच्छेद-370 से कोई समस्या पैदा हुई हो,सिवाय राजनीतिकों के बयानों और भाषणों के।यह देश बहुभाषी, बहुधर्मी,विभिन्न मत-मतान्तरों व अलग-अलग भौगोलिक पृष्टभूमी के चलते कुछ राज्यों के विकास को गति प्रदान करनें के लिए कुछ नये स्थानों के लिए नये ढंग से प्रावधानों को गढना आवश्यक है। अनुच्छेद-370 जैसा एक और अनुच्छेद-371 भी है, जो पूर्वोत्तर के कई राज्यों पर लागू है, तथापि समय-समय पर राज्यों के विधान मंडल और देश की संसद देश और राज्यों के लिए नये कानूनों और प्रावधानों का निर्माण करते रहते है।

दरअसल इस बहानें हम उत्तराखण्ड राज्य की चर्चा करना चाह रहें हैं अभी हाल में ही आई प्राकृतिक आपदा नें हिमालयी वाशिंदों और देश वासियों को जो संदेश दिया उस अर्लाम को समझना निहायत ही जरूरी हो गया है,इसीलिए इस राज्य को भी अनुच्छेद-370 जैसी की बाध्यता की आवश्यकता महसूस हो रही है। हालांकि इस अनुच्छेद में कई ऐसे प्रावधान हैं,जिन पर कई लोंगो को आपत्ति हो सकती है,यह नितांत राजनीति मुद्दा भी है,इसलिए स्पष्ट कर देंना जरूरी है कि उत्तराखण्ड राज्य पर अनुच्छेद-370 थोपनें जैसी किसी बात की हिमायत नही हो रही, अपितू जरूरत इस बात कि महसूस की जा रही है कि ऐसा कोई कठोर प्रावधान बनें,जिससे यहॉ कि प्राकृतिक संपदा पर मानवीय हस्तक्षेप कम से कम हो,या इस गुंजाइश को पूर्णतया समाप्त किया जाना चाहिए,कि यहॉ कि प्राकृतिक संपदा को किसी भी प्रकार का कोई अनावश्यक दबाव न झेलना पडे,पिछले कई वर्षों का इतिहास बताता है कि राज्य की प्राकृतिक संपदा पर बडे से बडे व्यापारियों, ठेकेदारों,दलालों बिचोलियो और वन माफियो की नजर रही है, हद तो तब हो गई जब सरकारों नें ही इशारों ही इशारों में इस राज्य की प्राकृतिक संपदा को लुटनें की खुली इजाजत दे दी,चिपको आन्दोलन इसी नीति की परिणति था, जब जबरन वन माफियों को जंगलो में घूसनें की छूट खुद सरकारयनें दी, तब प्रतिकार स्वरूप महिलाओं ने पेडों पर चिपक कर उसका जमकर विरोध किया तब जाकर उन्होंनें पेडों को बचाया। लेकिन आखिर सवाल उठता है कि राज्य की जनता कब तक सडकों पर आंदोलन रत रहेगी ? खासकर तब जब स्वंय सरकार पहाड के बेटे-बेटियों के हाथों में हैं ? लेकिन 16 वर्ष के उत्तराखण्ड को राजनीतिको नें सिवाय राजनीतिक महत्वाकंाक्षा का शिकार बनाया। इससे दुरूखद और क्या हो सकता है,कि पहाड टूटता,दरकता रहा और यहॉ का राजनीतिक वर्ग मैदानों में पलायन करता रहा, राज्य के तमाम बडे नेता जो कभी पहाड की जवानी और पानी को रोकनें की वकालत करते हुए चुनाव जीता करते थे,राज्य बननें के बाद पहले ही पलायन कर गये।
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इस राज्य को भी भगवान नें जम्मू और कश्मीर जैसी कुदरती खुबसूरती से नवाजा है। लेकिन इसके संरक्षण और रख-रखाव के लिए अनुच्छेद-370 जैसा कोई प्रावधान न तो पहले बना नही राज्य के अस्तित्व के बाद बना। नतीजन प्राकृतिक संसाधनों की लूट की परंपरा आज भी जीवित है जिससे राजनेता,अफसर और ठेकेदारों और माफियों की पौ-बारह है। राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 65 फीसदी भाग वनाच्छादित है,सिवाय जल राशि के रूप मेंकई प्रमुख नदियों का उद्गम स्थलों की भरमार है,मिलम,पिंडारी कफनी गंगोत्री व खतलिंग आदि महत्वपूर्ण ग्लेशियर इसी क्षेत्र में पडते हैं,हिमालय में कुल 238 ग्लेशियर हैं, तथा हिमालय के सबसे बडे ग्लेशियरों में से गंगोत्री ग्लेशियर (4,120 मी0 से लेकर,7000 मी0 की ऊॅचाई पर स्थित है, 30 किलोमीटर लम्बा और 02 से 04 किमी चैडा है।) एक है। इन्हीं से गंगा, यमुना और काली नदियॉ निकलती है। उत्तराखण्ड में वर्तमान में 6 राष्ट्रीय पार्क और 6 वन्य जीव विहार हैं। अपनी प्राकृतिक सुषमा के लिए जानें जाना वाला उत्तराखण्ड में फूलों की घाटी जैसे नयनाभिराम दृश्य भी हैं, लेकिन इस प्राकृतिक संपदा का उपयोग सरकार और तमाम माफियों नें अपनें व्यापारिक हितों के लिए जमकर किया। आये दिन नई-नई विद्युत परियोजनाओं को कमजोर और सवेंदनशील पहाड पर थोपा जा रहा हैं, वही सदानिरा नदियों के सतत प्रवाह को रोककर उनके जल को भी प्रदूषित किया जा रहा है,गंगा जैसी पवित्र नदी को बॉधों में डालकर उसकी शाश्वत पवित्रता को खतरे में डाला जा रहा है, वहीं राज्य भर की नदियों से लेकर गाढ-गधेरों में खनन माफिया चॉदी काट रहे हैं खनन से जहॉ नदियो के किनारे बसे नगरं-बस्तियों को खतरा उत्पन्न हो रहा वहीं लगभग सभी नदियों के तटों पर स्थित उपजाऊ खेती के विनाश को खुला आमंत्रण दिया जा रहा है।

अभी हाल में ही हरिद्वार में छापे के दौरान जो तथ्य सामनें आये वे चैंका देंनें वाले हैं,पाया गया कि क्षेत्र से करीब 400 ट्रकों में रेत-बजरी पडोसी राज्य उत्तर प्रदेश को जाता है,राज्य की एंटी मांइनिंग फोर्स नें हरिद्वार के श्यामपुर क्षेत्र में खनिज संपदा की लुट में शामिल वन विभाग और पुलिस कर्मियों की मिली भगत का भंडाफोड किया, इससे भी दूर्भाग्यपुर्ण और क्या हो सकता है,कि प्रकुति की इस सौगात को लुटनें में राज्य का हर सरकारी कर्मी लिप्त है,छापे के दौरान वन विभाग की कटेबड चैकी में कर्मचारियों के बिस्तरों के नीचे से 84,000 रू0 नगद प्राप्त हुए,यानें प्रकृति के खजानें को लुटनें में कोई भी पीछे नहीं है। इन्हीं नदियों पर अपनें चहेतों को बडी-छोटी विद्युत परियोजनाओं की बंदर बॉट की परम्परा भी समय-समय पर मुखर हो जाती है,इसी क्रम में कई बडी जल-विद्युत परियोजनाओं को पर्यावरण कार्यकर्ताओं के विरोध के आगे झुकना पडा नतीजन आधी-अधुरे काम के बाद उन्हें अब खंण्डर कर छोड दिया गया है,जबकि निर्माण के दौरान डायनामाइड जैसे विस्फोटको से बडे-बडे पहाडों को छलनी कर दिया गया था, आज हालात ये हैं कि थोडी सी बारिश पर भूस्खलन से बडे-से-बडे पहाड दरकनें लग जाते हैं, जो समय-समय पर बडी से बडी आपदा के साथ जन-धनकी हानि करते हैं। नरकोटा-सिरोबगड के मध्य लगभग 12 किमी के दायरे में डेंजर जोंन लगातार बढते हुए जा रहा है,लगभग एक दर्जन स्थानों पर बारिश के बाद बोल्डरों के गिरनें का सिलसिला बना हुआ है। इस समय राज्य की नदियों पर300 से उपर बिजली परियोजनाऐं प्रस्तावित हैं।
भारतीय वन सर्वेक्षण के ऑकडों के अनुसार राज्य में 2001 में सामान्य सघन वनों का क्षेत्रफल 19,023 वर्ग किमी था। जबकि 2011 में यह 14167 वर्ग किमी रह गया। हाल ही में एक सर्वेक्षण के बाद जी0एस0आई0 नें जनपद रूद्रप्रयाग,चमोली,उत्तरकाशी, पिथौरागढ और बागेश्वर जिलों में 21 विशेषज्ञ अधिकारियों के माध्यम से भूगर्भीय और भू-स्थायित्व के बारे में अध्ययन किया के बारे में अध्ययन किया गया । इस दौरान 274 स्थान ऐसे चिन्हित किये गये जो भू स्खलन की दृष्टि से खतरनाक हैं, 1,000 किमी सर्वेक्षण लम्बे क्षेत्र का सर्वेक्षण कार्य किया गया,जिसमें 67 प्रभावित ग्राम-कस्बों और अवस्थापना संबंधी भूवैज्ञानिक ऑकडे तैयार किये। झहिमालय विश्व की सबसे ऊॅची और सबसे युवा पर्वत श्रृखंला है, भूगर्भीय हलचलों के कारण हिमालय हर साल लगभग 5 मिमी0 ऊॅचा हो जाता है। मध्य हिमालय में बसे नवोदित राज्य उत्तराखण्ड प्राकृतिक और भौगोलिक दृष्टि से अत्यन्त संवेदनशील है, लगातार मानवीय हस्तक्षेप और मानवीय गतिविधियों से यहॉ निरंतर प्राकृतिक दूर्घटनाओं का क्रम जारी है हाल में राज्य में आई प्राकृतिक आपदा नें पूरे देश के जनमानस को हिला कर रख दिया, अकेले रूदप्रयाग जिले कि बात करें जहॉ केदारनाथ धाम स्थित है, तो वहॉ इस जल प्रलय नें इस क्षेत्र को तबाह कर दिया जिले में 649 लोंगों की मौत हुई,देश भर के विभिन्न राज्योंसे केदारनाथ यात्रा पर आये 3,218 तीर्थयात्री लापता हुए जिन्हें अब तक मृतक घोषित किया जा रहा है। इसके अलावा तीर्थाटन और पर्यटन व्यवसाय पूरी तरह चैपट हो चुका है,380 से ज्यादा मकान पूरी तरह धराशाही हो गये, करीब 800 मकानों को गंभीर व आंशिक क्षति पहुॅची,रूद्रप्रयाग जिले में 18 पुल ध्वस्त हुए, जिनका निर्माण तक नही हुआ,लोग ट्राली के सहारे जीवन गुजार रहे हैं। वहीं पूरी आपदा के दौरान कुल मरनें वालों का ऑकडा 4032 है, किन्तु माना जा रहा है कि जिस आपदा नें हर तरफ तबाही मचाई उसके चलतें यह ऑकडा दस हजार से कहीं अधिक भी हो सकता है,ग्लेशियरों से अवतरित होंनें वाली इन नदियों नें निचली घटियों में मानव बस्तियों को ही उजाड दिया। इस त्रासदी नें 22 हजार से अधिक परिवार प्रभावित हुए,तो 12,000 हैक्टे0 से अधिक कृषि भूमी तबाह हुई। हेम गंगा पर बना 200 साल पुराना पुलना-भ्यूॅडार पर भी टूटा रौद्र रूप लेकर आगे बढी, हें गंगा नें इस गॉव की खुशियों को अपनें साथ बहाते हुए 101 परिवारों को बेघर कर दिया। पर्यटन को ठीक ढंग से उभरनें के लिए 5 साल का वक्त लगनें का अनुमान है, पर्यटन विशेषज्ञ प्रो0 टी0के0 आचार्य के अनुसार अगले पॉच सालों में करीब 4 से 5 हजार करोड की राशि पर्यटन व्यवसाय को खडा करनें में लगेंगें।हे0न0ब0 गढवाल विश्वविद्यालय के भूगर्भ वैज्ञाानिकों का दावा है कि यह त्रासदी नें पिछले 600 सालों को भी पीछे छोड दिया है,अलकनंदा नदी में 11 बार बाढ आई जिसमें 2013 की बाढ को सर्वाधिक विनाशकारी मापा गया है,जब अलकनंदा का जल स्तर 4 मी0 से भी उपर पहॅुच गया।

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