भ्रष्टाचार के खिलाफ त्रिवेन्द्र सरकार का ढुलमुल रवैया

उत्तराखण्ड में पिछले करीब सतरह वर्षों में जितनी भी सरकारें आयीं, उन सभी के कार्यकाल भ्रष्टाचार अथवा घोटालों से अछूते नहीं रहे है। हैरानी की बात यह है कि इन सरकारों में कांग्रेस और भाजपा ही नहीं रहे, बल्कि बसपा, उक्रांद तथा निर्दलीय विधायक भी बराबर के शरीक रहे हैं।

इनके बड़े-बड़े घोटाले सडक़ों से लेकर विधानसभा में सदन के अन्दर तक जोरदार ढंग से गूंजे, लेकिन आज तक इन घोटालो की जांच रिपोर्ट का खुलासा सार्वजनिक नहीं किया गया है। जिसका कि राज्य की जनता को जानने का पूरा अधिकार है। आज राज्य में एक बार फिर से भाजपा की सरकार के आने पर उसने फिर से जो ढाई माह पूर्व भ्रष्टाचार को समान्त करने का ऐलान किया था, वह फुर्र हो गया नजर आ रहा है।

राज्य के अन्दर अब तक की रही विभिन्न सरकारों में भुवन चन्द्र खण्डूरी की सरकार का चरित्र भ्रष्टाचार के खिलाफ अग्रणी माना जाता है। खण्डूरी ने लोकपाल कानून उत्तराखण्ड के अन्दर लागू करने की मजबूत पहल भी की थी, परन्तु उनकी सरकार को अपंग करके उस समय गिरा दिया गया था और भ्रष्टाचार के खिलाफ वह कानून राज्य में नहीं आ सका।

हालांकि बीसी खण्डूरी ने 56 घोटालों की जांच को लेकर आयोग का गठन भी किया था और सभी घोटालों की जांच भी हुई, लेकिन उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गयी। जो कि आज तक जाने कहां दबी हुई पड़ी है। ऐसे में समय के करवट बदलने के साथ सूबे में भाजपा की बनी सरकार के मुखिया मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भी भ्रष्टाचार के खिलाफ हुंकार पूरे आत्म विश्वास के साथ भरी, लेकिन राज्य का यह बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्रदेश भ्रष्टाचार से मुक्त होता नजर नहीं आ रहा है।

राज्य की त्रिवेन्द्र सरकार को ढाई माह का वक्त हो गया है, लेकिन उनके सभी दावे और वायदे उडऩ-छू नजर आ रहे हैं। राज्य के बड़े-बड़े घोटालों का जब पूर्व की सरकारें खुलासा नहीं कर पाई हैं तो भला मौजूदा त्रिवेन्द्र के नेतृत्व वाली सरकार इस दिशा में क्या कदम उठा पाएगी? यह एक बेहद टेढ़ा और कड़ुवा सवाल है।

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