विपक्ष को संघ का कट्टर चेहरा राष्ट्रपति उम्मीदवार के रुप में मंजूर नहीं

राष्ट्रपति चुनाव में आम सहमति की संभावनाएं तलाशने के लिए शुक्रवार को होने वाली बैठक से पहले ही विपक्ष ने साफ संदेश दे दिया है कि संघ का घोर हिन्दूवादी चेहरा राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर उसे मंजूर नहीं होगा। ऐसा हुआ तो विपक्ष भी अपना उम्मीदवार मैदान में उतरेगा।

हालांकि वामपंथी दलों के छोडक़र विपक्षी गोलबंदी में शामिल अधिकांश दल भाजपा के नरमपंथी और उदारवादी चेहरे पर आम सहमति बनाने के खिलाफ नहीं हैं। आम सहमति के लिए विपक्ष की तय की गई इस सैद्धांतिक रूपरेखा को देखते हुए गृहमंत्री राजनाथ सिंह और सूचना प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू की शुक्रवार को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और माकपा नेता सीताराम येचुरी से होने वाली मुलाकात बेहद अहम है।

विपक्ष को उम्मीद है कि अब तक सस्पेंस रख रही सरकार अपने संभावित राष्ट्रपति प्रत्याशी का नाम विपक्षी नेताओं को बताएगी। हालांकि सूत्र का साफ कहना था कि कांग्रेस नेतृत्व राजनाथ के जरिए 26 मई को राष्ट्रपति चुनाव पर 17 विपक्षी दलों की ओर से पारित संयुक्त प्रस्ताव से सरकार को औपचारिक रुप से रुबरू कराएगा। सोनिया की अगुआई में विपक्षी नेताओं की इस बैठक में संविधान और देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने में गहरी आस्था रखने वाले शख्सियत को आम सहमति से राष्ट्रपति बनाने के लिए सरकार से पहल करने को कहा गया था।

विपक्ष का कहना है कि संघ के कट्टर चेहरे को राष्ट्रपति प्रत्याशी के रुप में इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि संघ संविधान में बदलाव का मुखर हिमायती रहा है। संघ प्रमुख मोहन भागवत के संविधान की समीक्षा करने तो संघ के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य के आरक्षण की व्यवस्था को खत्म करने की राय को विपक्ष इसका ज्वलंत नमूना मानता है। विपक्षी गोलबंदी में शामिल जदयू के राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी इस बारे में कहते हैं कि राष्ट्रपति संविधान का रखवाला होता है और जब संविधान को बदलने वाली सोच सोच रखने वाले इस पद पर आसीन होंगे तो फिर संविधान कैसे सुरक्षित रहेगा।

राष्ट्रपति उम्मीदवारी पर सरकार और विपक्ष के बीच इस सैद्धांतिक दूरी के बावजूद एनडीए का पलड़ा भारी है। इसीलिए विपक्षी मोर्चे में वामदलों के अलावा तमाम अन्य पार्टियां भाजपा के उदारवादी चेहरे पर सहमति बनाने के पक्ष में हैं। वामदल और कांग्रेस के अलावा विपक्षी खेमे में शामिल अन्य दल इस बात के हिमायती हैं कि यदि सुषमा स्वराज जैसे चेहरे को सरकार प्रत्याशी बनाती है तो सहमति बनाने का प्रयास होना चाहिए।

मगर सोनिया गांधी के खिलाफ सुषमा के बेल्लारी से चुनाव लडऩे के इतिहास को देखते हुए कांग्रेस के लिए इस पर राजी होना आसान नहीं। ऐसे में सरकार का उदारवादी चेहरा आया तो विपक्ष को अपनी एकजुटता बनाए रखने के लिए भी मशक्कत करनी पड़ सकती है। बहरहाल यह याद रखना होगा कि माकपा नेता सीताराम येचुरी विपक्ष की दस सदस्यीय राष्ट्रपति चुनाव पर बनी समिति की बैठक में एनडीए के खिलाफ उम्मीदवार उतारने की स्पष्ट राय जाहिर की थी।

ऐसे में कांग्रेस के पास वामदलों की नाराजगी की कीमत पर आम सहमति के लिए तैयार होना मुश्किल है। खासतौर पर तब जब 2002 में सैद्धांतिक वैचारिक विरोध की वजह से ही वामदलों ने कैप्टन लक्ष्मी सहगल को तत्कालीन एनडीए राष्ट्रपति उम्मीदवार एपीजे अब्दुल कलाम के खिलाफ चुनाव में उतारा था।

जबकि कांग्रेस समेत तमाम दलों ने कलाम का समर्थन किया था। विपक्षी दलों के बीच आम सहमति के सवाल पर मतभेद की आशंका के बारे में पूछे जाने पर केसी त्यागी ने कहा कि छोटी-मोटी बात पर एकता नहीं टूटनी चाहिए। विपक्षी गोलबंदी की बुनियाद रखने में जुटी कांग्रेस आम सहमति के लिए अपनी राजनीतिक जरूरत की कुर्बानी नहीं देगी।

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